Tuesday, December 8, 2020

मध्यकालीन इतिहास जानने के स्रोत

 मध्यकालीन इतिहास जाने के लिए मध्यकालीन साहित्य प्रमुख है मध्यकालीन साहित्य को दो भागों में बांटा गया है जिसमें

 प्रथम सल्तनत कालीन साहित्य व 

 द्वितीय मुगलकालीन स्रोत 

1 सल्तनत कालीन साहित्य सल्तनत कालीन साहित्य वह साहित्य है जिनका लेखन दिल्ली सल्तनत के समय किया गया था इस प्रकार के साहित्य निम्न है

 1 चचनामा इस ग्रंथ के लेखक के बारे में बारे में जानकारी प्राप्त नहीं होती है इसी कारण इसका लेखक अज्ञात है इस ग्रंथ में मोहम्मद कासिम के द्वारा किए गए भारत आक्रमण के बारे में जानकारी प्राप्त होती है

 2 तारीख ए सिंध इस ग्रंथ की रचना इस ग्रंथ की रचना अमीर मासूम के द्वारा की गई थी इस ग्रंथ को तारीखे इस  सिंध भी कहा जाता है इस ग्रंथ से मोहम्मद कासिम के आक्रमण से लेकर अकबर तक की  अर्थात अकबर के शासन काल तक की जानकारी मिलती है

 3 तारीख उल हिंद- इस ग्रंथ की रचना अलबरूनी के द्वारा की गई थी इस ग्रंथ में मोहम्मद गजनवी के समय भारतीय स्थिति के बारे में वर्णन मिलता है

 4 ताज उल मासिर - इस ग्रंथ के रचनाकार हसन निजामी है इस ग्रंथ में गोरी के आक्रमण से लेकर दिल टूट के प्रारंभिक वर्षों की जानकारी प्राप्त होती है नोट इस ग्रंथ में अजमेर शहर की समृद्धि का वर्णन किया गया है

 5 तबकात ए नासिरी- इस ग्रंथ की रचना मिनहाज उस सिराज के द्वारा की गई थी इस ग्रंथ में 23 अध्याय है इस ग्रंथ में बताया गया है कि मिनहाज उस सिराज एक इतिहासकार के साथ-साथ एक कवि भी था इस ग्रंथ में हिजरी संवत 658 तक की जानकारी मिलती है 

खजाइन उल फुतूह- इस ग्रंथ की रचना अमीर खुसरो के द्वारा की गई थी इस करंट में मोहम्मद बिन तुगलक तक की जानकारी प्राप्त होती है

 7 देवल रानी- इस ग्रंथ की रचना अमीर खुसरो के द्वारा की गई थी इस ग्रंथ में खिज्र खिज्र खां तथा देवल रानी के प्रेम के बारे में जानकारी प्राप्त होती है 

8 तुगलकनामा इस ग्रंथ का रचयिता भी अमीर खुसरो था जिसमें तुगलक वंश से संबंधित जानकारी प्राप्त होती है

 9 नूह सिपिहर- ग्रंथ का रचीयता  अमीर खुसरो था 

10 तारीख ए फिरोजशाही इस ग्रंथ के रचयिता बरनी था इस ग्रंथ में किस ग्रंथ में बलबन के राज्याभिषेक से लेकर से फिरोज तुगलक की शासन 6 वर्ष तक की जानकारी प्राप्त होती है

 11 फ़ुतुहते ए फिरोजशाही इस ग्रंथ की रचना फिरोजशाह तुगलक के द्वारा की गई थी इस ग्रंथ में फिरोज़ शाह तुगलक के द्वारा किए गए अपने कार्य तथा अपने आदेशों के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है

 12 किताब उल रेहला इस ग्रंथ का रचयिता इब्नबतूता था इस ग्रंथ में तुगलक वंश से संबंधित जानकारी प्राप्त होती है मुहम्मद बिन तुगलक की प्रशासनिक जानकारी प्रमुख है 

13 फतवा ए जहांदारी किस ग्रंथ की रचना बरनी के द्वारा की गई थी  

14 फ़ुतुह उस सलातीन इस ग्रंथ की रचना अबू बकर इसामी के द्वारा की गई थी 

15तारीख ए मुबारक शाही इस ग्रंथ की रचना अहमद अब्दुल्ला सर् हिंदी के द्वारा की गई थी

Saturday, November 28, 2020

Bodh dhram के त्रिरत्न

 त्रिरत्न (तीन रत्न) बौद्ध धर्म के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इन त्रिरत्नों पर ही बौद्ध धर्म आधारित हैं।

त्रिरत्न :- बुद्धधम्म और संघ.

बौद्ध धर्म

की श्रेणी का हिस्सा

DharmaWheelGIF.gif
बौद्ध धर्म का इतिहास
· बौद्ध धर्म का कालक्रम
· बौद्ध संस्कृति
बुनियादी मनोभाव
चार आर्य सत्य ·
आर्य अष्टांग मार्ग ·
निर्वाण · त्रिरत्न · पँचशील
अहम व्यक्ति
गौतम बुद्ध · बोधिसत्व
क्षेत्रानुसार बौद्ध धर्म
दक्षिण-पूर्वी बौद्ध धर्म
· चीनी बौद्ध धर्म
· तिब्बती बौद्ध धर्म ·
पश्चिमी बौद्ध धर्म
बौद्ध साम्प्रदाय
थेरावाद · महायान
· वज्रयान
बौद्ध साहित्य
त्रिपतक · पाळी ग्रंथ संग्रह
· विनय
· पाऴि सूत्र · महायान सूत्र
· अभिधर्म · बौद्ध तंत्र


बुद्धसंपादित करें

बुद्ध का मतलब जागृत एवं अनंत ज्ञानी मनुष्य, जिसने खुद के प्रयासों से बुद्धत्व प्राप्त किया। ‘बुद्ध’ शाक्यमूनी तथागत गौतम बुद्ध है।

बुद्ध = तार्किक ज्ञान (विचारक-वि0 कौशल कान्त बौद्ध)

धम्मसंपादित करें

बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को धम्म कहते हैं। संपूर्ण बौद्ध धर्म ‘धम्म' पर आधारित है।

धम्म= नैतिकता (विचारक-वि0 कौशल कान्त बौद्ध)

संघसंपादित करें

बौद्ध धर्म में बौद्ध भिक्खूओं और बौद्ध उपासकों के संघटन को संघ कहते हैं। बौद्ध भिक्खू और बौद्ध उपासक ये दोनों ही बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। धम्म प्रचार के लिए संघ का महत्त्वपूर्ण योगदान होता हैं।

संघ=राज्य ; तर्कप्रधानो की संगत (विचारक-वि0 कौशल कान्त बौद्ध)

Form wikipidia

Thursday, September 24, 2020

सिंधु सभ्यता

                     सिंधु  सभ्यता 



सिंधु सभ्यता की सर्व प्रथम खोज के संदर्भ महत्वपूर्ण सभ्यता होने के मत दिए हैं 1826 में मैं जब चार्ल्स मिशन नामक अंग्रेज अधिकारी के द्वारा वहां से उसे कोई सभ्यता होने का दावा किया परंतु इसे आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया गया इसके पश्चात 1856 ईसवी में जब बटन बंधुओं के द्वारा रेलवे लाइन डालने के लिए हड़प्पा का उत्खनन किया तभी वहां ईटें प्राप्त हुई और उन्होंने हड़प्पा सभ्यता होने का उल्लेख किया परंतु इस पर ध्यान नहीं गया इसके पश्चात 1912 ईस्वी में जे ए 
 फ्लीट   महोदय ने हड़प्पा कालीन उत्खनन से प्राप्त मुद्राओं को प्रकाश कर करवायाऔर  उनको प्रकाश में लाया गया था 
नामकरण
 इसके पश्चात जब 1920 में माधव स्वरूप पर और दयाराम साहनी के द्वारा जॉन मार्शल के नेतृत्व में पाकिस्तान की माउंट गु मरी क्षेत्र का उत्खनन प्रारंभ किया यह स्थल हड़प्पा नामक ना होने के कारण हड़प्पा सभ्यता  नाम दिया गया कुछ समय पश्चात 1922 ईस्वी में सिंध नदी के किनारे मोहनजोदड़ो नामक स्थान से सभ्यता होने की जानकारी प्राप्त हुई और इश्क उत्खनन श्री राखल दास बनर्जी के द्वारा किया गया तब इसका नाम मोहनजोदड़ो लिया गया इस इसके पश्चात कई स्थलों की खोज हुई जो ज्यादातर सिंधु नदी के किनारे का इसी कारण इसी सिंधु सभ्यता कहा गया परंतु इसके पश्चात सिंधु के साथ-साथ इसकी सहायक नदी सरस्वती नदी के किनारे भी पूरा स्थलों की खोज हुई इसी कारण इस कविता को सिंधु सरस्वती सभ्यता का हाल है लेकिन इस सभ्यता उत्खनन से ज्यादातर मात्रा में कौन सी धातु की प्राप्ति हुई इसी कारण यह सविता कांस्य  युगीन सभ्यता के नाम से जानी जाती है
विशेष 
1 हड़प्पा सभ्यता  सबसे पहले इस स्थल की खोज होने के कारण  इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता खा जाता है 
2 सिंधु सभ्यता  सिंधु नदी के आस पास स्थलों की खोज होने के कारण इसे सिंधु सभ्यता नाम दिया गया था 
3 सिंधु सरस्वति  सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे स्थल मिलने के कारण इस सभ्यता का नाम सरस्वती सभ्यता दिया गया था 
4 काँस्य युगीन सभ्यता इस सभ्यता में अधिक मात्रा में कांस्य धातु की प्राप्ति हुई है इसी कारण इसे कांस्य युगीन सभ्यता खा जाता है 
सिन्धुसभ्यता का कालक्रम  
सिंधु सभ्यता के बारे में विद्वान एकमत नहीं है इसी कारण इस सभ्यता कालक्रम  के बारे में अपने अलग-अलग मत दिए हैं जो इस प्रकार से हैं मार्टिन व्हीलर के अनुसार इस सभ्यता का कार्यक्रम 30 ईसवी से लेकर 1500 तक है रेडियो कार्बन विधि के अनुसार इस सभ्यता का कार्यक्रम 35 साल पूर्व से लेकर तेरा ईसा पूर्व है इस विधि को तीन भागों में बांटा गया है एक पूर्व हड 
विस्तार 
 सिंधु सभ्यता का विस्तार सिंधु सभ्यता का विस्तार भी बहुत अधिक है यह उत्तर में मांडा  से लेकर दक्षिण के के दैमाबाद वे पूर्व पूर्व में आलमगीरपुर से लेकर पश्चिम की सुत्कन्गेडोर   तक विस्तृत है इसकी उत्तर से दक्षिण तक की लंबाई 1600 किलोमीटर वह पूर्व से लेकर पश्चिम तक की लंबाई 1400 किलोमीटर हैं सिंधु सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल अफगानिस्तान में सो सो गई वह मुंडी कार है पाकिस्तान में 1 बलूचिस्तान में सुतकांगडोर  बालाकोट डाबर कोट आदि है। 
 a सुतकांगेन्डोर यह पश्चिम  बलूचिस्तान के दासक के नदी के तट पर स्थित है इसकी खोज आरेल  स्टाइन के द्वारा की गई   इसे  हड़प्पा कहां व्यापार का चौराया भी कहा जाता है 
 bआलमगीरपुर  यह सिंधु सभ्यता का पूर्वी स्थल है जो हिंडन नदी किनारे स्थित है 
c दैमाबाद  यह दक्षिण में प्रवरा नदी के किनारे स्थित है 
d मांडा  यह सिंधु सभ्यता का उत्तरी स्थल है जो चिनाब नदी के  किनारे स्थित है 

सिंधु सभ्यता का विस्तार भारत ,पाकिस्तान,अफगानिस्तान देशो में विस्तृत है 
अफगानिस्तान    
 अफगानिस्तान में सिंधु सभ्यता के दो प्रमुख स्थल है 
1 शोर्तुगाई 
2 मुंडीगार्क 
पाकिस्तान     
पाकिस्तान में सिंधु सभ्यता के प्रमुख पूरा स्थल है 

Thursday, June 18, 2020


Jump to navigationJump to se
मुग़ल साम्राज
साम्राज्य
1526–1857
Flag of the Mughal Empire
Map of Mughal Empire.
औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य ल. 1700
राजधानीआगरा
(1526–1571)
फतेहपुर सीकरी
(1571–1585)
लाहौर
(1585–1598)
आगरा
(1598–1648)
शाहजहानाबाद/दिल्ली
(1648–1857)
भाषाएँफ़ारसी (सरकारी और अदालती भाषा)[1]
चग़ताई (सिर्फ शुरुआत में)
उर्दू (बाद की अवधि में)
धार्मिक समूहइस्लाम
(1526–1582)
दीन-ए-इलाही
(1582–1605)
इस्लाम
(1605–1857)
शासनपूर्ण राजशाहीएकात्मक राज्य
संघीय संरचना के साथ
बादशाह[2]
 - 1526–1530बाबर (पहला)
 - 1837–1857बहादुर शाह द्वितीय (आखिरी)
इतिहास
 - पानीपत युद्ध21 अप्रैल 1526
 - प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम10 मई 1857
क्षेत्रफल
 - 1700[a]44,00,000 किमी ² (16,98,849 वर्ग मील)
जनसंख्या
 - 1700[a] est.15 
     

घनत्व
/किमी ²  ( /वर्ग मील)
मुद्रारुपया
पूर्ववर्ती
अनुगामी
तिमुरिड राजवंश
दिल्ली सल्तनत
सूरी साम्राज्य
आदिल शाही राजवंश
[[बंगाल की सल्तनत]]
डेक्कन सल्तनत
मराठा साम्राज्य
दुर्रानी साम्राज्य
ब्रिटिश राज
हैदराबाद राज्य
कर्नाटक के नवाब
बंगाल के नवाब
अवध के नवाब
मैसूर का साम्राज्य
भरतपुर राज्य
आज इन देशों का हिस्सा है:Flag of Afghanistan.svg अफ़ग़ानिस्तान
Flag of Bangladesh.svg बांग्लादेश
Flag of India.svg भारत
Flag of Pakistan.svg पाकिस्तान
Flag of Tajikistan.svg ताजिकिस्तान
WarningValue specified for "continentdoes not comply
मुग़ल साम्राज्य (फ़ारसीمغل سلطنت ھند‎, मुग़ल सलतनत-ए-हिंद; तुर्की: बाबर इम्परातोरलुग़ु), एक इस्लामी तुर्की-मंगोल साम्राज्य था जो 1526 में शुरू हुआ, जिसने 17 वीं शताब्दी के आखिर में और 18 वीं शताब्दी की शुरुआत तक भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया और 19 वीं शताब्दी के मध्य में समाप्त हुआ।
मुग़ल सम्राट तुर्क-मंगोल पीढ़ी के तैमूरवंशी थे और इन्होंने अति परिष्कृत मिश्रित हिन्द-फारसी संस्कृति को विकसित किया। 1700 के आसपास, अपनी शक्ति की ऊँचाई पर, इसने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग को नियंत्रित किया - इसका विस्तार पूर्व में वर्तमान बंगलादेश से पश्चिम में बलूचिस्तान तक और उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कावेरी घाटी तक था। उस समय 44 लाख किमी² (15 लाख मील²) के क्षेत्र पर फैले इस साम्राज्य की जनसंख्या का अनुमान 13 और 15 करोड़ के बीच लगाया गया था।[4] 1725 के बाद इसकी शक्ति में तेज़ी से गिरावट आई। उत्तराधिकार के कलह, कृषि संकट की वजह से स्थानीय विद्रोह, धार्मिक असहिष्णुता का उत्कर्ष और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से कमजोर हुए साम्राज्य का अंतिम सम्राट बहादुर ज़फ़र शाह था, जिसका शासन दिल्ली शहर तक सीमित रह गया था। अंग्रेजों ने उसे कैद में रखा और 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद ब्रिटिश द्वारा म्यानमार निर्वासित कर दिया।
1556 में, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर, जो महान अकबर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के पदग्रहण के साथ इस साम्राज्य का उत्कृष्ट काल शुरू हुआ और सम्राट औरंगज़ेब के निधन के साथ समाप्त हुआ, हालाँकि यह साम्राज्य और 150 साल तक चला। इस समय के दौरान, विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने में एक उच्च केंद्रीकृत प्रशासन निर्मित किया गया था। मुग़लों के सभी महत्वपूर्ण स्मारक, उनके ज्यादातर दृश्य विरासत, इस अवधि के हैं।

प्रारंभिक इतिहास[संपादित करें]

प्रारंभिक 1500 के आसपास तैमूरी राजवंश के राजकुमार बाबर के द्वारा उमैरिड्स साम्राज्य के नींव की स्थापना हुई, जब उन्होंने दोआब पर कब्जा किया और खोरासन के पूर्वी क्षेत्र द्वारा सिंध के उपजाऊ क्षेत्र और सिंधु नदी के निचले घाटी को नियंत्रित किया।[5][मृत कड़ियाँ][5] 1526 में, बाबर ने दिल्ली के सुल्तानों में आखिरी सुलतान, इब्राहिम शाह लोदी, को पानीपत के पहले युद्ध में हराया। अपने नए राज्य की स्थापना को सुरक्षित करने के लिए, बाबर को खानवा के युद्ध में राजपूत संधि का सामना करना पड़ा जो चित्तौड़ के राणा साँगा के नेतृत्व में था। विरोधियों से काफी ज़्यादा छोटी सेना द्वारा हासिल की गई, तुर्क की प्रारंभिक सैन्य सफलताओं को उनकी एकता, गतिशीलता, घुड़सवार धनुर्धारियों और तोपखाने के इस्तेमाल में विशेषता के लिए ठहराया गया है।
1530 में बाबर का बेटा हुमायूँ उत्तराधिकारी बना लेकिन पश्तून शेरशाह सूरी के हाथों प्रमुख उलट-फेर सहे और नए साम्राज्य के अधिकाँश भाग को क्षेत्रीय राज्य से आगे बढ़ने से पहले ही प्रभावी रूप से हार गए। 1540 से हुमायूं एक निर्वासित शासक बने, 1554 में साफाविद दरबार में पहुँचे जबकि अभी भी कुछ किले और छोटे क्षेत्र उनकी सेना द्वारा नियंत्रित थे। लेकिन शेर शाह सूरी के निधन के बाद जब पश्तून अव्यवस्था में गिर गया, तब हुमायूं एक मिश्रित सेना के साथ लौटे, अधिक सैनिकों को बटोरा और 1555 में दिल्ली को पुनः जीतने में कामयाब रहे।
हुमायूं ने अपनी पत्नी के साथ मकरन के खुरदुरे इलाकों को पार किया, लेकिन यात्रा की निष्ठुरता से बचाने के लिए अपने शिशु बेटे जलालुद्दीन को पीछे छोड़ गए। जलालुद्दीन को बाद के वर्षों में अकबर के नाम से बेहतर जाना गया। वे सिंध के शहर, अमरकोट में पैदा हुए जहाँ उनके चाचा अस्करी ने उन्हें पाला। वहाँ वे मैदानी खेल, घुड़सवारी और शिकार करने में उत्कृष्ट बने और युद्ध की कला सीखी। तब पुनस्र्त्थानशील हुमायूं ने दिल्ली के आसपास के मध्य पठार पर कब्ज़ा किया, लेकिन महीनों बाद एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई, जिससे वे दायरे को अस्थिर और युद्ध में छोड़ गए।
अकबर का दरबार
14 फरवरी 1556 को दिल्ली के सिंहासन के लिए सिकंदर शाह सूरी के खिलाफ एक युद्ध के दौरान, अकबर अपने पिता के उत्तराधिकारी बने। उन्होंने जल्द ही 21 या 22 की उम्र में अपनी अठारहवीं जीत हासिल करी। वह अकबर के नाम से जाने गए। वह एक बुद्धिमान शासक थे, जो निष्पक्ष पर कड़ाई से कर निर्धारित करते थे। उन्होंने निश्चित क्षेत्र में उत्पादन की जाँच की और निवासियों से उनकी कृषि उपज के 1/5 का कर लागू किया। उन्होंने एक कुशल अधिकारीवर्ग की स्थापना की और धार्मिक मतभेद से सहिष्णुशील थे, जिससे विजय प्राप्त किए गए लोगों का प्रतिरोध नरम हुआ। उन्होंने राजपूतों के साथ गठबंधन किया और हिन्दू जनरलों और प्रशासकों को नियुक्त किया था।
उमैरिड्स के सम्राट अकबर के बेटे जहाँगीर ने 1605-1627 के बीच (22 वर्ष) साम्राज्य पर शासन किया। अक्टूबर 1627 में, उमैरिड्स के सम्राट जहाँगीर के बेटे शाहजहाँ सिंहासन के उत्तराधिकारी बने, जहाँ उन्हें भारत में एक विशाल और समृद्ध साम्राज्य विरासत में मिला। मध्य-सदी में यह शायद विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य था। शाहजहाँ ने आगरा में प्रसिद्ध ताज महल (1630–1653) बनाना शुरू किया जो फारसी वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी द्वारा शाहजहाँ की पत्नी मुमताज़ महल के लिए कब्र के रूप में बनाया गया था, जिनका अपने 14 वें बच्चे को जन्म देते हुए निधन हुआ। 1700 तक यह साम्राज्य वर्तमान भारत के प्रमुख भागों के साथ अपनी चरम पर पहुँच चुका था, औरंगजेब आलमगीर के नेतृत्व के तहत उत्तर पूर्वी राज्यों के अलावा, पंजाब की सिख भूमि, मराठाओं की भूमि, दक्षिण के क्षेत्र और अफगानिस्तान के अधिकांश क्षेत्र उनकी जागीर थे। औरंगजेब, महान तुर्क राजाओं में आखिरी थे। फारसी भोजन का जबर्दस्त प्रभाव भारतीय रसोई की परंपराओं में देखा जा सकता है जो इस अवधि में प्रारंभिक थे।

मुगल राजवंश[संपादित करें]

अकबर के अंतर्गत मुग़ल साम्राज्य औरंगजेब के अधीन साम्राज्य के क्षेत्र में विस्तार हुआ।
मध्य-16 वीं शताब्दी और 17-वीं शताब्दी के अंत के बीच मुग़ल साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमुख शक्ति थी। 1526 में स्थापित, यह नाममात्र 1857 तक बचा रहा, जब वह ब्रिटिश राज द्वारा हटाया गया। यह राजवंश कभी कभी तिमुरिड राजवंश के नाम से जाना जाता है क्योंकि बाबर तैमूर का वंशज था।
फ़रग़ना वादी से आए एक तुर्की मुस्लिम तिमुरिड सिपहसालार बाबर ने मुग़ल राजवंश को स्थापित किया। उन्होंने उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों पर हमला किया और दिल्ली के शासक इब्राहिम शाह लोधी को 1526 में पानीपत के पहले युद्ध में हराया। मुग़ल साम्राज्य ने उत्तरी भारत के शासकों के रूप में दिल्ली के सुल्तान का स्थान लिया। समय के साथ, उमेर द्वारा स्थापित राज्य ने दिल्ली के सुल्तान की सीमा को पार किया, अंततः भारत का एक बड़ा हिस्सा घेरा और साम्राज्य की पदवी कमाई। बाबर के बेटे हुमायूँ के शासनकाल के दौरान एक संक्षिप्त राजाए के भीतर (1540-1555), एक सक्षम और अपने ही अधिकार में कुशल शासक शेर शाह सूरी के अंतर्गत अफगान सूरी राजवंश का उदय देखा। हालाँकि, शेर शाह की असामयिक मृत्यु और उनके उत्तराधिकारियों की सैन्य अक्षमता ने 1555 में हुमायूँ को अपनी गद्दी हासिल करने के लिए सक्षम किया। हालाँकि, कुछ महीनों बाद हुमायूं का निधन हुआ और उनके 13 वर्षीय बेटे अकबर ने गद्दी हासिल करी।
मुग़ल विस्तार का सबसे बड़ा भाग अकबर के शासनकाल (1556-1605) के दौरान निपुण हुआ। वर्तमान भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तराधिकारि जहाँगीरशाहजहाँ और औरंगजेब द्वारा इस साम्राज्य को अगले सौ साल के लिए प्रमुख शक्ति के रूप में बनाया रखा गया था। पहले छह सम्राट, जिन्होंने दोनों "विधि सम्मत" और "रेल्" शक्तियों का आनंद लिया, उन्हें आमतौर पर सिर्फ एक ही नाम से उल्लेख करते हैं, एक शीर्षक जो प्रत्येक महाराज द्वारा अपने परिग्रहण पर अपनाई जाती थी। प्रासंगिक शीर्षक के नीचे सूची में मोटे अक्षरों में लिखा गया है।
अकबर ने कतिपय महत्वपूर्ण नीतियों को शुरू किया था, जैसे की धार्मिक उदारवाद (जजिया कर का उन्मूलन), साम्राज्य के मामलों में हिन्दुओं को शामिल करना और राजनीतिक गठबंधन/हिन्दू राजपूत जाति के साथ शादी, जो कि उनके वातावरण के लिए अभिनव थे। उन्होंने शेर शाह सूरी की कुछ नीतियों को भी अपनाया था, जैसे की अपने प्रशासन में साम्राज्य को सरकारों में विभाजित करना। इन नीतियों ने निःसंदेह शक्ति बनाए रखने में और साम्राज्य की स्थिरता में मदद की थी, इनको दो तात्कालिक उत्तराधिकारियों द्वारा संरक्षित किया गया था, लेकिन इन्हें औरंगजेब ने त्याग दिया, जिसने एक नीति अपनाई जिसमें धार्मिक सहिष्णुता का कम स्थान था। इसके अलावा औरंगजेब ने लगभग अपने पूरे जीवन-वृत्ति में डेक्कन और दक्षिण भारत में अपने दायरे का विस्तार करने की कोशिश की। इस उद्यम ने साम्राज्य के संसाधनों को बहा दिया जिससे मराठा, पंजाब के सिखों और हिन्दू राजपूतों के अंदर मजबूत प्रतिरोध उत्तेजित हुआ।
Two Mughal Emperors and Shah Alam c. 1876
औरंगजेब के शासनकाल के बाद, साम्राज्य में गिरावट हुई। बहादुर शाह ज़फ़र के साथ शुरुआत से, मुगल सम्राटों की सत्ता में उत्तरोत्तर गिरावट आई और वे कल्पित सरदार बने, जो शुरू में विभिन्न विविध दरबारियों द्वारा और बाद में कई बढ़ते सरदारों द्वारा नियंत्रित थे। 18 वीं शताब्दी में, इस साम्राज्य ने पर्शिया के नादिर शाह और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली जैसे हमलावरों का लूट को सहा, जिन्होंने बार बार मुग़ल राजधानी दिल्ली में लूटपाट की। भारत में इस साम्राज्य के क्षेत्रों के अधिकांश भाग को ब्रिटिश को मिलने से पहले मराठाओं को पराजित किया गया था। 1803 में, अंधे और शक्तिहीन शाह आलम II ने औपचारिक रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का संरक्षण स्वीकार किया। ब्रिटिश सरकार ने पहले से ही कमजोर मुग़लोँ को "भारत के सम्राट" के बजाय "दिल्ली का राजा" कहना शुरू कर दिया था, जो 1803 में औपचारिक रूप से प्रयोग किया गया, जिसने भारतीय नरेश की ब्रिटिश सम्राट से आगे बढ़ने की असहज निहितार्थ से परहेज किया। फिर भी, कुछ दशकों के बाद, BEIC ने सम्राट के नाममात्र नौकरों के रूप में और उनके नाम पर, अपने नियंत्रण के अधीन क्षेत्रों में शासन जारी रखा, 1827 में यह शिष्टाचार भी खत्म हो गया था।सिपाही विद्रोह के कुछ विद्रोहियों ने जब शाह आलम के वंशज बहादुर जफर शाह II से अपने निष्ठा की घोषणा की, तो ब्रिटिशों ने इस संस्था को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने 1857 में अंतिम मुग़ल सम्राट को पद से गिराया और उन्हें बर्मा के लिए निर्वासित किया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार मुग़ल राजवंश का अंत हो गया, जिसने भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय का योगदान किया था।

मुग़ल बादशाहों की सूची[संपादित करें]

मुग़ल सम्राटों के बारे में कुछ महत्वपूर्ण विवरण नीचे सारणीबद्ध है:
महाराजाजन्मशासन कालमृत्युनोट्स
बाबर24 फ़रवरी 14831526–15301530बाबर के पिता उमरशेख मिर्जा, फ़रग़ना के छोटे राज्य के शासक थे। बाबर फ़रग़ना की गद्दी पर 8 जून 1494 ईस्वी में बैठा। बाबर ने 1507 ईस्वी में बादशाह की उपाधि धारण की, जिसे अब तक किसी तैमूर शासक ने धारण नहीँ किया था। बाबर के चार पुत्र थे हुमायूँ, कामरान, असकरी और हिँदाल। बाबर ने भारत पर पाँच बार आक्रमण किया।
नसीरुद्दीन मोहम्मद हुमायूँ6 मार्च 15081530-1540जनवरी 1556सूरी राजवंश द्वारा शासन बाधित हुआ। युवा और अनुभवहीनता के उदगम की वजह से उन्हें, शक्तिशाली शेर शाह सूरी से कम प्रभावी शासक माना गया।
शेर शाह सूरी14721540-1545मई 1545हुमायूँ को1539में चौंसा के युदध में हराकर पद से गिराया और सूरी राजवंश का नेतृत्व किया; घनिष्ठ, प्रभावी प्रशासन नीतियों की शुरुआत की जो बाद में अकबर द्वारा अपनाई जाएंगी।
इस्लाम शाह सूरीc.15001545-15541554सूरी राजवंश का दूसरा और अंतिम शासक, अपने पिता की तुलना में साम्राज्य पर कम नियंत्रण के साथ; बेटे सिकंदर और आदिल शाह के दावे, हुमायूँ के बहाली के द्वारा समाप्त हो गए।
नसीरुद्दीन मोहम्मद हुमायूँ6 मार्च 15081555-1556जनवरी 1556 दीनपनाह पुस्तकालय (दिल्ली) की सिढियो से गिरकर।प्रारंभिक शासनकाल 1530-1540 की तुलना में बहाल नियम अधिक एकीकृत और प्रभावी था; अपने बेटे अकबर के लिए एकीकृत साम्राज्य छोड़ गए।
जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर14 नवम्बर 15421556-160527 अक्टूबर 1605अकबर ने साम्राज्य में सबसे अधिक क्षेत्र जोड़े और मुगल राजवंश के सबसे शानदार शासक माने जाते हैं; उन्होंने उन्हीं की तरह राजपूताना की एक राजकुमारी जोधा से शादी की। जोधा एक हिन्दू थी। पहले बहुत से लोगों ने विरोध किया, लेकिन उसके अधीन, हरात्मक मुस्लिम/हिन्दू संबंध उच्चतम पर थे।
नुरुद्दीन मोहम्मद जहाँगीरअक्टूबर 15691605-16271627जहाँगीर ने बेटों के अपने सम्राट पिता के खिलाफ विद्रोही होने की मिसाल दी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ पहला संबंध बनाया। एक शराबी कथित हुए और उनकी पत्नी महारानी नूर जहान, सिंहासन के पीछे की असली ताकत बनी और उनके स्थान पर सक्षम शासन किया।
शहाबुद्दीन मोहम्मद शाहजहाँ, सिंहासन के उदगम से पहले राजकुमार खुर्रम के नाम से जाने गए5 जनवरी 15921627-16581666उसके तहत, मुग़ल कला और शिल्प उनके शीर्षबिंदु पर पहुँचा; ताजमहलजहाँगीर समाधि और लाहौर में शालीमार गार्डन का निर्माण किया। उनके बेटे औरंगजेब द्वारा पद से हटाए गए और कैद किए गए।
मोइनुद्दीन मोहम्मद औरंगजेब आलमगीर21 अक्टूबर 16181658-17073 मार्च 1707अपव्ययी और अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले हिन्दू और हिन्दू धर्म के प्रति असहिष्णु; साम्राज्य को अपनी सबसे बड़ी भौतिक हद तक लाया। मुग़ल साम्राज्य पर इस्लामी शरिया लागू किया। अत्यधिक नीतियों की वजह से उनकी मृत्यु के बाद कई दुश्मनों ने साम्राज्य को कम किया।
बहादुरशाह जफर I
उर्फ शाह आलम I
14 अक्टूबर 16431707-1712फ़रवरी 1712मुग़ल सम्राटों में पहले जिन्होंने साम्राज्य के नियंत्रण और सत्ता की स्थिरता और तीव्रता में गिरावट की अध्यक्षता करी। उनके शासनकाल के बाद, सम्राट एक उत्तरोत्तर तुच्छ और कल्पित सरदार बन कर रह गए।
जहान्दर शाह16641712-1713फ़रवरी 1713वह केवल अपने मुख्यमंत्री जुल्फिकार खान के हाथों की कठपुतली था। जहान्दर शाह का काम, मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को नीचे ले आया।
फुर्रूखसियर16831713-171917191717 में उन्होंने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल के लिए शुल्क मुक्त व्यापार के लिए फिर्मन प्रधान किया और भारत में उनकी स्थिति की पुष्टि की।
रफी उल-दर्जातअज्ञात17191719 
रफी उद-दौलत
उर्फ शाहजहाँ II
अज्ञात17191719 
निकुसियरअज्ञात17191743 
मोहम्मद इब्राहिमअज्ञात17201744 
मोहम्मद शाह17021719-1720, 1720-174817481739 में पर्शिया के नादिर-शाह का आक्रमण सहा।
अहमद शाह बहादुर17251748-541754 
आलमगीर II16991754-17591759 
शाहजहाँ IIIअज्ञात1759 संक्षेप में1770s 
शाह आलम II17281759-180618061761 में अहमद-शाह-अब्दाली का आक्रमण सहा; 1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के 'निज़ामी' को BEIC को प्रदान किया, 1803 में औपचारिक रूप से BEIC का संरक्षण स्वीकार किया।
अकबर शाह II17601806-18371837ब्रिटिश सुरक्षा में नाममात्र कल्पित सरदार
बहादुर ज़फ़र शाह II17751837-185718५८ब्रिटिशों द्वारा पद से गिराए गए और इस महान गदर के बाद बर्मा के लिए निर्वासित हुए। बहादुर शाह के बच्चों को मार दिया गया और उनको बर्मा भेज दिया गया।

भारतीय उपमहाद्वीप पर मुग़ल प्रभाव[संपादित करें]

मुग़ल साम्राज्य द्वारा निर्मित ताज महल
भारतीय उपमहाद्वीप के लिए मुग़लों का प्रमुख योगदान उनकी अनूठी वास्तुकला थी। मुग़ल काल के दौरान मुस्लिम सम्राटों द्वारा ताज महल सहित कई महान स्मारक बनाए गए थे। मुस्लिम मुग़ल राजवंश ने भव्य महलों, कब्रों, मीनारों और किलों को निर्मित किया था जो आज दिल्लीढाकाआगराजयपुरलाहौरशेखपुराभारतपाकिस्तान और बांग्लादेश के कई अन्य शहरों में खड़े हैं।[6][7]
गर्मियों में शालीमार गार्डन।
उनके उत्तराधिकारियों ने, मध्य एशियाई देश के कम यादों के साथ जिसके लिए उन्होंने इंतज़ार किया, उपमहाद्वीप की संस्कृति का एक कम जानिबदार दृश्य लिया और काफी आत्मसत बने। उन्होंने कई उपमहाद्वीपों के लक्षण और प्रथा को अवशोषित किया। भारत के इतिहास में दूसरों की तुलना में मुग़ल काल ने भारतीय, ईरानी और मध्य एशिया के कलात्मक, बौद्धिक और साहित्यिक परंपरा का एक और अधिक उपयोगी का सम्मिश्रण देखा। भारतीय उपमहाद्वीप की दोनों, हिन्दू और मुस्लिम परम्पराओं, संस्कृति और शैली पर भारी प्रभाव पड़ा था। वे उपमहाद्वीप के समाजों और संस्कृति के लिए कई उल्लेखनीय बदलाव लाए, जिसमें शामिल हैं:

  • केंद्रीकृत सरकार जो कई छोटे राज्यों को एक साथ लाए।
  • पर्शियन कला और संस्कृति जो भारतीय कला और संस्कृति के साथ सम्मलित हुई।
  • अरब और तुर्क भूमि में नए व्यापार मार्गों को प्रारंभ किया। इस्लाम अपनी उच्चतम अवस्था में था
  • मुग़लई भोजन
  • उर्दू भाषा, स्थानीय भाषा हिन्दी से विकसित हुई जो कि फारसी और बाद में अरबी और तुर्की से उधार लेकर बनी। मुग़ल काल में भारतीय और इस्लामी संस्कृति के विलय के परिणाम के रूप में उर्दू भाषा विकसित हुई। आधुनिक हिन्दीसंस्कृत-आधारित शब्दावली और फारसी, अरबी और तुर्की के ऋण शब्द का उपयोग करती है। यह पारस्परिक रूप से सुगम और उर्दू के समान है। सामूहिक रूप में दोनों कभी कभी हिन्दूस्तानी के नाम से जाने जाते हैं। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है कि यह बॉलीवुड फिल्मों में और पाकिस्तान के प्रमुख शहरी सेटिंग में प्रयोग किए जाने वाली भाषा है।
  • वास्तुकला की एक नई शैली
  • लैंडस्केप बागवानी

मुग़लों के तहत कला और वास्तुकला का उल्लेखनीय कुसुमित कई कारकों के कारण है। इस साम्राज्य ने कलात्मक प्रतिभा के विकास के लिए एक सुरक्षित ढांचा प्रदान किया और इस उपमहाद्वीप के इतिहास में अद्वितीय धन और संसाधनों को बढावा दिया। स्वयं मुग़ल शासक कला के असाधारण संरक्षक थे, जिनकी बौद्धिक क्षमता और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को सबसे परिष्कृत स्वाद में व्यक्त किया गया था। हालाँकि जिस पर उन्होंने कभी शासन किया था वह हिन्दूस्तान अब पाकिस्तान, भारत और बंगलादेश में बँट गया है, पर उनका प्रभाव आज भी व्यापक रूप से देखा जा सकता है। सम्राटों के मकबरे भारत और पाकिस्तान भर में फैले हुए हैं। इनके 160 लाख वंश, महाद्वीप और संभवतः दुनिया भर में फैले हुए हैं।