पेशवा का इतिहास
जब 1707 ईस्वी में बहादुर शाह के द्वारा साहू को खेत से मुक्त कर दिया जाता है उसी समय धनाजी जाधव की मृत्यु हो जाती है तभी उनके पुत्र चंद्रसेन जाधव जो ताराबाई की शरण में पहुंच जाता है तभी बालाजी विश्वनाथ साहू की शरण में उपस्थित होते हैं सेवा में उपस्थित होते हैं इसी समय मराठा शक्ति के पश्चिम का रक्षक कान्होजी आँगड़े तभी उसको कूटनीति के माध्यम से अपनी ओर मिला लिया
हालांकि इस पद की शुरुआत शिवाजी के काल में ही हो गई थी परंतु इस पद की वास्तविक शुरुआत साहू के काल में ही होती है और इस साल के काल में ही प्रतिष्ठित स्थान पर पहुंचता है जब 1707 ईस्वी में साहू को रिहा कर दिया जाता है तभी मराठा दो शक्तियों के मध्य विभक्त होते हैं इसी समय साहू का साथ बालाजी विश्वनाथ के द्वारा दिया जाता है इसी कारण साहू ने पेशवा का पद बालाजी विश्वनाथ को जाता है और इसी से ही पेशवा की वास्तविक शक्ति का उदय होता है इस बालाजी विश्वनाथ की द्वारा ही साहू की स्थिति को सुदृढ़ किया गया जिसमें सर्वप्रथम ताराबाई को खेड़ा के युद्ध में पराजित करके इसी व्यवस्थित रूप प्रदान किया इसके पश्चात कहीं कूटनीति के काम लेते हुए भी बालाजी विश्वनाथ के द्वारा कार्य किया है इसके पश्चात 1719 ईस्वी में मुगल मराठा संधि करवाई जाती है जो दिल्ली की संधि के नाम से भी जानी जाती है नोट इस संधि के तहत ही साहू को 10000 का मनसब दिया गया इसी संधि के अनुसार साहू के द्वारा हुसैन बंधु की सहायता के लिए बालाजी विश्वनाथ तथा खंडेराव दामाद इको भेजा गया इसके पश्चात 1720 ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो जाती और उसके पश्चात उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा
बनता है
बाजीराव प्रथम 1720 1740
बाजीराव प्रथम को मराठा शक्ति पर प्रकाष्ठा का तक पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है उसने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि विदेशियों को भारत से निकाल दें और हिंदू अपनी कीर्ति स्थापित कर ले आओ हम इस पुरानी वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें इसकी डालियां तो अपने आप ही गिर जाएगी और उसने यह भी कहा कि मराठा शक्ति कृष्णा नदी तक अपना अटक फराहने लग जाएगी
जब 1724 स्ट्रीमिंग हैदराबाद की स्थापना होती है तो हैदराबाद के निजाम के द्वारा मराठों में फूट डालने का प्रयास किया और संभाजी कीजिए को सहायता देने का प्रयास किया परंतु उसकी यह कूटनीति के चार सफल नहीं हो सकी और बाजीराव के द्वारा निजाम की सेना को पराजित किया गया इसके पश्चात 1728 ईस्वी में मालखेड़ा का युद्ध होता है जिसमें निजाम को हार नसीब होती है इसके पश्चात निजाम तथा मराठों के मध्य मुंशी शिव गांव की संधि होती है इस संधि की निम्न शर्तें एक निजाम ने साहू को चौथ तथा सरदेशमुखी का अधिकार दिया दो साहू जी को समस्त मराठा शासक स्वीकार कर लिया 3 संभाजी द्वितीय को पन्हाला दुर्ग में भेजने का निर्णय लिया था
जब 1707 ईस्वी में बहादुर शाह के द्वारा साहू को खेत से मुक्त कर दिया जाता है उसी समय धनाजी जाधव की मृत्यु हो जाती है तभी उनके पुत्र चंद्रसेन जाधव जो ताराबाई की शरण में पहुंच जाता है तभी बालाजी विश्वनाथ साहू की शरण में उपस्थित होते हैं सेवा में उपस्थित होते हैं इसी समय मराठा शक्ति के पश्चिम का रक्षक कान्होजी आँगड़े तभी उसको कूटनीति के माध्यम से अपनी ओर मिला लिया
हालांकि इस पद की शुरुआत शिवाजी के काल में ही हो गई थी परंतु इस पद की वास्तविक शुरुआत साहू के काल में ही होती है और इस साल के काल में ही प्रतिष्ठित स्थान पर पहुंचता है जब 1707 ईस्वी में साहू को रिहा कर दिया जाता है तभी मराठा दो शक्तियों के मध्य विभक्त होते हैं इसी समय साहू का साथ बालाजी विश्वनाथ के द्वारा दिया जाता है इसी कारण साहू ने पेशवा का पद बालाजी विश्वनाथ को जाता है और इसी से ही पेशवा की वास्तविक शक्ति का उदय होता है इस बालाजी विश्वनाथ की द्वारा ही साहू की स्थिति को सुदृढ़ किया गया जिसमें सर्वप्रथम ताराबाई को खेड़ा के युद्ध में पराजित करके इसी व्यवस्थित रूप प्रदान किया इसके पश्चात कहीं कूटनीति के काम लेते हुए भी बालाजी विश्वनाथ के द्वारा कार्य किया है इसके पश्चात 1719 ईस्वी में मुगल मराठा संधि करवाई जाती है जो दिल्ली की संधि के नाम से भी जानी जाती है नोट इस संधि के तहत ही साहू को 10000 का मनसब दिया गया इसी संधि के अनुसार साहू के द्वारा हुसैन बंधु की सहायता के लिए बालाजी विश्वनाथ तथा खंडेराव दामाद इको भेजा गया इसके पश्चात 1720 ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो जाती और उसके पश्चात उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा
बनता है
बाजीराव प्रथम 1720 1740
बाजीराव प्रथम को मराठा शक्ति पर प्रकाष्ठा का तक पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है उसने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि विदेशियों को भारत से निकाल दें और हिंदू अपनी कीर्ति स्थापित कर ले आओ हम इस पुरानी वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें इसकी डालियां तो अपने आप ही गिर जाएगी और उसने यह भी कहा कि मराठा शक्ति कृष्णा नदी तक अपना अटक फराहने लग जाएगी
जब 1724 स्ट्रीमिंग हैदराबाद की स्थापना होती है तो हैदराबाद के निजाम के द्वारा मराठों में फूट डालने का प्रयास किया और संभाजी कीजिए को सहायता देने का प्रयास किया परंतु उसकी यह कूटनीति के चार सफल नहीं हो सकी और बाजीराव के द्वारा निजाम की सेना को पराजित किया गया इसके पश्चात 1728 ईस्वी में मालखेड़ा का युद्ध होता है जिसमें निजाम को हार नसीब होती है इसके पश्चात निजाम तथा मराठों के मध्य मुंशी शिव गांव की संधि होती है इस संधि की निम्न शर्तें एक निजाम ने साहू को चौथ तथा सरदेशमुखी का अधिकार दिया दो साहू जी को समस्त मराठा शासक स्वीकार कर लिया 3 संभाजी द्वितीय को पन्हाला दुर्ग में भेजने का निर्णय लिया था