Friday, February 14, 2020

पेशवा का इतिहास
जब 1707 ईस्वी में बहादुर शाह के द्वारा साहू को खेत से मुक्त कर दिया जाता है उसी समय धनाजी जाधव की मृत्यु हो जाती है तभी उनके पुत्र चंद्रसेन जाधव जो ताराबाई की शरण में पहुंच जाता है तभी बालाजी विश्वनाथ साहू की शरण में उपस्थित होते हैं सेवा में उपस्थित होते हैं इसी समय मराठा शक्ति के पश्चिम का रक्षक कान्होजी आँगड़े तभी उसको कूटनीति के माध्यम से अपनी ओर मिला लिया
हालांकि इस पद की शुरुआत शिवाजी के काल में ही हो गई थी परंतु इस पद की वास्तविक शुरुआत साहू के काल में ही होती है और इस साल के काल में ही प्रतिष्ठित स्थान पर पहुंचता है जब 1707 ईस्वी में साहू को रिहा कर दिया जाता है तभी मराठा दो शक्तियों के मध्य विभक्त होते हैं इसी समय साहू का साथ बालाजी विश्वनाथ के द्वारा दिया जाता है इसी कारण साहू ने पेशवा का पद बालाजी विश्वनाथ को जाता है और इसी से ही पेशवा की वास्तविक शक्ति का उदय होता है इस बालाजी विश्वनाथ की द्वारा ही साहू की स्थिति को सुदृढ़ किया गया जिसमें सर्वप्रथम ताराबाई को खेड़ा के युद्ध में पराजित करके इसी व्यवस्थित रूप प्रदान किया इसके पश्चात कहीं कूटनीति के काम लेते हुए भी बालाजी विश्वनाथ के द्वारा कार्य किया है इसके पश्चात 1719 ईस्वी में मुगल मराठा संधि करवाई जाती है जो दिल्ली की संधि के नाम से भी जानी जाती है नोट  इस संधि के तहत ही  साहू को 10000 का मनसब दिया गया इसी संधि  के अनुसार  साहू के द्वारा  हुसैन बंधु की सहायता के लिए  बालाजी विश्वनाथ  तथा  खंडेराव  दामाद इको  भेजा गया इसके पश्चात 1720 ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो जाती और उसके पश्चात उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा
 बनता है
बाजीराव प्रथम 1720 1740
बाजीराव प्रथम को मराठा शक्ति पर प्रकाष्ठा का तक पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है उसने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि विदेशियों को भारत से निकाल दें और हिंदू अपनी कीर्ति स्थापित कर ले आओ हम इस पुरानी वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें इसकी डालियां तो अपने आप ही गिर जाएगी और उसने यह भी कहा कि मराठा शक्ति कृष्णा नदी तक अपना अटक फराहने लग जाएगी
जब 1724 स्ट्रीमिंग हैदराबाद की स्थापना होती है तो हैदराबाद के निजाम के द्वारा मराठों में फूट डालने का प्रयास किया और संभाजी कीजिए को सहायता देने का प्रयास किया परंतु उसकी यह कूटनीति के चार सफल नहीं हो सकी और बाजीराव के द्वारा निजाम की सेना को पराजित किया गया इसके पश्चात 1728 ईस्वी में मालखेड़ा का युद्ध होता है जिसमें निजाम को हार नसीब होती है इसके पश्चात निजाम तथा मराठों के मध्य मुंशी शिव गांव की संधि होती है इस संधि की निम्न शर्तें एक निजाम ने साहू को चौथ तथा सरदेशमुखी का अधिकार दिया दो साहू जी को समस्त मराठा शासक स्वीकार कर लिया 3 संभाजी द्वितीय को पन्हाला दुर्ग में भेजने का निर्णय लिया था

Wednesday, February 5, 2020

शिवाजी के उत्तराधिकारी
शिवाजी की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार संघर्ष आरंभ होता है इसी समय शिवाजी की मुख्य रूप से दो पत्नियां थी जिसमें एक सवेरा भाई वे दूसरी सईबाई निंबालकर था दोनों पत्नियों से एक  एक पुत्र हुए पुत्र हुए जिसमें शिवाजी की इच्छा के अनुसार राजाराम मृत्यु के पश्चात शासक बने उसी समय शिवाजी के दूसरे पुत्र संभाजी कैद में थे मृत्यु का अर्थात शिवाजी की मृत्यु का समाचार जैसे ही संभाजी को प्राप्त होता है तो वे अपने को कैद रखने वाले सेना नायक को रिश्वत देकर निकलने में कामयाब हो जाते हैं और उसी समय राजाराम को हटाकर शिवम शासक बन जाते
संभाजी
संभाजी का जन्म साईं बाई निंबालकर की कोख से 1657 को हुआ था तथा इनकी गुरु का नाम केशव पर तथा उमा जी पंडित था इनकी पत्नी का नाम येसूबाई तथा इनके एक पुत्र हुआ जिनका नाम साहू था
20 जुलाई 1680 को संभाजी शासक बनते हैं तथा अपना राज्याभिषेक रायगढ़ में करवाते हैं और रायगढ़ को ही अपनी राजधानी बनाते हैं आरंभ से ही संभाजी क्रोधी विलासी तथा अभिमानी गुण मौजूद थे जिसके कारण धीरे धीरे द्वेष की भावना उदय होने लगी और साम्राज्य में षडयंत्र रचे जाने लगे जैसे ही संभाजी शासक बनते हैं तो अपनी परम मित्र कवि कलश को प्रमुख प्रधान सलाहकार नियुक्त करते हैं इसी कारण शिवाजी द्वारा गठित अष्टप्रधान का खंडन होता है संभाजी के विरुद्ध रचे जाने वाले षडयंत्र ओं में राजाराम उसकी माता सोयराबाई तथा अन्नाजी दत्तो थे जो संभाजी की विरुद्ध है एक संगठन बनाया परंतु संभाजी के द्वारा इस संगठन को बड़ी निर्दयता पूर्वक कुचल दिया गया इसके पश्चात संभाजी की द्वारा सीपीयू अंग्रेजों तथा पुर्तगालियों के मध्य संघर्ष आरंभ होता है और इसी समय औरंगजेब का विद्रोही पुत्र अकबर संभाजी की शरण में उपस्थित होता है तभी वह उसी सहायता देने का वचन कर देते हैं अपनी विद्रोही पुत्र का पीछा करते हुए 1686 ईस्वी में औरंगजेब दक्षिण पहुंचता है और 1688 ईस्वी में संभाजी तथा कवि कलश दोनों विलास गढ़ भाग जाते हैं वहीं औरंगजेब की सुविधा मकरम खान के द्वारा विलास गढ़ का खेड़ा डाला जाता है उसी समय कवि कलश तथा संभाजी की हत्या कर दी जाती है और संभाजी के पुत्र साहू को कैद में डाल दिया जाता है इसके पश्चात पुणे राजाराम साहू का संक्षिप्त बनता है
राजाराम 1690 से 1700
संभाजी की मृत्यु के पश्चात साहू की संरक्षक के रूप में राजाराम शासक बनता है वह एक साहसी प्रतिभावान व्यक्ति था परंतु वह एक योग्य सेनापति नहीं था बढ़ती हुई मुगल में मराठा गतिरोध के मध्य औरंगजेब के द्वारा दक्षिण का सूबेदार जुल्फिकार खान को नियुक्त किया जाता है जिसने यह सुबह तथा साहू को कैद कर लिया जाता है इसी समय मराठों के साथ उनका प्रधान सेनापति सूर्य जीपी साल मराठों के साथ विश्वासघात करते हैं वही यह सुबह तथा साहू को कृपया और करवाता है इसी समय इसका विरोध पहलाद मीरा जी तथा शंकर जी नारायण के द्वारा किया जाता है परंतु वह साहू तथा यीशु भाई को की धोने से नहीं बचा पाते इसके पश्चात राजाराम राइड को छोड़कर जिंजी को अपना केंद्र वह राजधानी बनाते हैं जो लगभग 1698 इसवी तक रहता है इसके पश्चात जुल्फीकार खान के द्वारा जिन जी का घेरा डाला जाता है परंतु वह सफल नहीं हो पाता है तभी राजाराम की द्वारा सातारा को अपना केंद्र बनाया जाता है तथा इसी को ही अपनी राजधानी बनाई जाती है इसी समय राजा राम के द्वारा अष्टप्रधान में एक नई पद का गठन किया जाता है जिसका नाम प्रतिनिधि था इनके अलावा भी राजा राम के द्वारा 2 नए पद सृजित किए जाते हैं जिसमें हुकूमत पनाह तथा पद सचिव था
शिवाजी द्वितीय 1700 1707 1700 ईस्वी में राजा राम की मृत्यु के पश्चात उसका 4 वर्षीय राजाराम द्वितीय को शासक बनाया जाता है परंतु शासन की वास्तविक शक्तियां उसकी माता ताराबाई के हाथ में थी जिसके कारण ताराबाई को ही शासक माना जाता है यह एक वीर साहसी महिला थी जिसने रायगढ़ सातारा तथा सीहल गढ़ पर अपना अधिकार कर लिया इसने मुगलों के विरुद्ध भी संघर्ष जारी रखा तथा इस समय औरंगजेब के द्वारा दक्षिण का सुविधा जुल्फिकार खान को बनाया तथा कुछ समय पश्चात औरंगजेब की मृत्यु हो गई उस समय उत्तराधिकार के युद्ध में मुअज्जम बहादुर शाह के नाम से शासक बना तभी जुल्फिकार खान के द्वारा बहादुर शाह को समझाया और जुल्फिकार खान के समझाने पर बहादुर शाह की द्वारा केंद मैं बंद मराठा शासक अर्थात साहू को रिहा कर दिया जिसके कारण मराठों में उत्तराधिकार संघर्ष पर आम और मराठा दो भागों में विभक्त हो गए जिसमें अधिकांश मराठा  के द्वारा साहू को समर्थन दिया गया तब साहू अपना स्थान हासिल करने तथा वहीं दूसरी ओर ताराबाई अपनी प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए दोनों के मध्य खेड़ा का युद्ध होता है यह युद्ध 12 अक्टूबर 1707 मैं लड़ा गया जिसमें साहू बालाजी विश्वनाथ की सहायता से विजय प्राप्त की तभी साहू के द्वारा बालाजी विश्वनाथ को अपना प्रथम पेशवा नियुक्त कर दिया उसके पश्चात 1708 स्विमिंग साहू के द्वारा सातारा पर अधिकार के शिवम को शासित घोषित कराता  है साहू 1708 1749 जैसे ही साहू शासक बनता है तभी उसकी द्वारा सेनाकर्ते पद का गठन किया या सर्जन की तथा इस पद पर बालाजी विश्वनाथ को नियुक्त कर दिया गया इसी घटना के तहत उत्तरी मराठा शक्ति का केंद्र सातारा जिसका मुखिया साहू वे दक्षिणी मराठा शक्ति का केंद्र कोल्हापुर हो गया और उसका मुखिया शिवाजी द्वितीय बना 1719 ईस्वी में हुसैन बंधु की मदद से मुगल बादशाह रफी उर जात के मध्य  मुगल मराठा संधि होती है  यह संधि  दिल्ली की संधि के नाम से भी जानी जाती है इस संधि की शर्ते  निम्न है  इसी संधि के पेड़ साहू को  मराठा शक्ति के रूप में मान्यता दी गई दो  इसी संधि के तहत शाम को दक्षिण क्षेत्र में 6 सीटों पर  चौथा  सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दिया है नोट  इसी संधि को रिचर्ड डे टेंपल मराठा का मैग्नाकार्टा कहा जाता है इसके पश्चात बालाजी विश्वनाथ 1 वर्ष तक मराठों को वित्तीय साधन व्यवस्थित करने में लगाया तथा 1720 ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो जाती है इसके पश्चात 1728 इसमें नहीं पाल खेड़ा का युद्ध होता है इसके पश्चात 1731 ईस्वी में शिवाजी द्वितीय की मृत्यु हो जाती है इसके पश्चात संभाजी भी थी शासक बनते हैं और 1731 ईस्वी में वरना की संधि होती है जिसमें साहू को ही प्रमुख मान लिया जाता है और शिवाजी दी थी साहू के अधीन शासन करते हैं इसके पश्चात 1749ईसवी को साउथ की मृत्यु हो जाती है और उसकी पहचान राजा राम सेकंड शासक बनता और 1750 नाम मात्र का छत्रपति रहता है और मराठा शक्ति का प्रमुख पेशवा बन जाता और बालाजी बाजीराव के द्वारा समस्त शक्तियां अपने हाथ में ले ली जाती है
                मराठा
मराठा  का उद्धभव 
मराठा शब्द का शाब्दिक अर्थ महान संघर्ष होता है जिसका उल्लेख ग्रांड डफ अपनी पुस्तक  " हिस्ट्री ऑफ मराठा"  में करते हैं तथा उन्होंने कहा है कि मराठों का उदय एक आकस्मिक अग्निकांड की भांति हुआ है वहीआंद्रेविंक नामक विद्वान ने मराठों का उदय एक षड्यंत्र के संदर्भ में माना है जो क्रमश  200 वर्ष बात कर्मिक विकास से होता है मराठों को मुगलों के खिलाफ दक्कन का रक्षा कवच समझा जाता है मराठों की शक्ति महसूस करने वाला पहला शासक जहांगीर था जिसने मराठों का केंद्र बिंदु दक्कन को माना तथा वह कहता था कि मराठी दुर्गेश जाति  है जो इस देश की शक्ति का केंद्र है इनके पश्चात जदुनाथ सरकार के द्वारा शिवाजी के बारे में कहा है कि" मैं शिवाजी को हिंदू जाति का उत्पन्न किया हुआ अंतिम महान क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र का निर्माता मानता हूं" वही रानाडे के द्वारा" शिवाजी को नेपोलियन की भांति संगठित करने वाला व्यक्ति माना  है"तथा रानाडे यह भी कहता है कि यदि औरंगजेब दक्षिणी भारत पर आक्रमण ने करता तो मराठों का उदय ना होता लेकिन यह है एक अतिशयोक्ति है क्योंकि मराठों का उदय जहांगीर के काल में ही हो गया था और वह शाहजहां के काल शाहजी एक नेतृत्व करने वाले व्यक्ति के रूप में ऊपर कर सामने आए थे

ऐसा कहा जाता है कि शिवाजी के वंशज जो पहले मेवाड़ राजघराने से संबंधित थे एक उल्लेख के अनुसार जब अलाउद्दीन खिलजी 1303 ईस्वी में मेवाड़ पर आक्रमण करता है तो उसी समय मेवाड़ के सज्जनसिंह 
महाराष्ट्र चले जाते हैं इन सज्जन सिंह जी की पांचवीं पीढ़ी के वंशज उग्रसेन हुए थे और उग्रसेन के दो पुत्र हुए जिनमें एक का नाम करण सिंह तथा दूसरे का नाम शुभकरण था शुभकरण के वंशज भोंसले के लाए और इसी शुभकरण की दो पुत्र हुए थे जिसमें एक मालोजी तथा दूसरी विठोजी थी इन दोनों भाई अपना जीवन यापन करने के लिए कृषि कार्य करना प्रारंभ कर दिया गया तथा कशिश से जीवन यापन में होने के कारण मालू जी लखुजी जाधव के अंगरक्षक बन गए इसी समय मालू जी की एक पुत्र होता है जिसका नाम शाहजी रखा जाता है कुछ समय पश्चात मालू जी लखुजी जाधव की नौकरी छोड़कर अहमदनगर की सुल्तान की यहां नौकरी करते हैं तथा वहीं दूसरी ओर शाहजी लखुजी जाधव की वहीं रहते हैं तभी लखुजी जाधव ने अपनी पुत्री जीजाबाई का विवाह सहा जी के साथ करते हैं जब 1620 ईस्वी में मालू जी की मृत्यु हो जाती है तभी शाहजी मलिक अंबर की सहायता से जहांगीर के दरबार में उपस्थित होते हैं तभी जहांगीर के द्वारा शाहजी को उमरा वर्ग दिया जाता है इसी समय 1624 ईस्वी में अहमदनगर तथा मुगलों के मध्य भटवाड़ी का युद्ध होता है इस युद्ध में मलिक अंबर तथा शाहजी के द्वारा मुगलों का प्रतिनिधित्व किया गया वहीं दूसरी ओर अहमदनगर की सुल्तान के द्वारा इस युद्ध में भाग लिया इस युद्ध में मुगलों को विजय प्राप्त होती है और इससे सहा जी की प्रतिष्ठा में भर्ती होती है तभी मलिक अंबर उनसे ईर्ष्या करने लग जाता है तभी शाहजी पुणे बीजापुर की सुल्तान की सेवा में चले जाते हैं 1630 ईस्वी में सहा जी पुनः शाहजहां की सेवा में उपस्थित होते हैं तभी शाहजहां के द्वारा शाह जी को 5000 का मनसब प्रदान किया जाता है तभी 1632 ईस्वी में अहमदनगर के  सुल्तानमुतर्जा प्रथम  की हत्या हो जाती है तभी शाह जी के द्वारा उसके पुत्र मुतर्जा  द्वितीय को शासक बनाने की घोषणा की जाती है जिससे शाहजी शासन की संपूर्ण बागडोर अपने हाथों में लेते हैं और तभी मुगलों से द्वेष की भावना पैदा हो जाती है और 1634 36 ईसवी में शहाजी तथा मुगलों के मध्य संघर्ष प्रारंभ होता है अंत में शाहजी पराजित होते हैं और वह शाहजहां से समझौता कर लेते हैं और औरंगजेब के द्वारा अहमदनगर को अपने साम्राज्य में मिला लिया जाता है इसके पश्चात शाह  जी के द्वारा कर्नाटक अभियान किया जाता है और 1639 ईस्वी में शीरा का अभियान तथा 1640 ईस्वी में बेंगलुरु विजय आदि प्रमुख है इसके पश्चात बीजापुर के सुल्तान के द्वारा 1648 ईस्वी में सहा जी को कैद कर लिया जाता है तभी शिवाजी के द्वारा विरोध करने पर उन्हें 1649 ईस्वी में रिहा किया जाता है और 1663 ईस्वी में शाह जी के द्वारा वेद नूर सेत्र पर अधिकार किया जाता है वह 1664 ईस्वी में शाह जी हिरन  का शिकार करते समय  घोड़ी से गिरने के कारण चोट लग जाती है जिसके कारण उनकी मृत्यु हो जाती है