मराठा
मराठा का उद्धभव
मराठा शब्द का शाब्दिक अर्थ महान संघर्ष होता है जिसका उल्लेख ग्रांड डफ अपनी पुस्तक " हिस्ट्री ऑफ मराठा" में करते हैं तथा उन्होंने कहा है कि मराठों का उदय एक आकस्मिक अग्निकांड की भांति हुआ है वहीआंद्रेविंक नामक विद्वान ने मराठों का उदय एक षड्यंत्र के संदर्भ में माना है जो क्रमश 200 वर्ष बात कर्मिक विकास से होता है मराठों को मुगलों के खिलाफ दक्कन का रक्षा कवच समझा जाता है मराठों की शक्ति महसूस करने वाला पहला शासक जहांगीर था जिसने मराठों का केंद्र बिंदु दक्कन को माना तथा वह कहता था कि मराठी दुर्गेश जाति है जो इस देश की शक्ति का केंद्र है इनके पश्चात जदुनाथ सरकार के द्वारा शिवाजी के बारे में कहा है कि" मैं शिवाजी को हिंदू जाति का उत्पन्न किया हुआ अंतिम महान क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र का निर्माता मानता हूं" वही रानाडे के द्वारा" शिवाजी को नेपोलियन की भांति संगठित करने वाला व्यक्ति माना है"तथा रानाडे यह भी कहता है कि यदि औरंगजेब दक्षिणी भारत पर आक्रमण ने करता तो मराठों का उदय ना होता लेकिन यह है एक अतिशयोक्ति है क्योंकि मराठों का उदय जहांगीर के काल में ही हो गया था और वह शाहजहां के काल शाहजी एक नेतृत्व करने वाले व्यक्ति के रूप में ऊपर कर सामने आए थे
ऐसा कहा जाता है कि शिवाजी के वंशज जो पहले मेवाड़ राजघराने से संबंधित थे एक उल्लेख के अनुसार जब अलाउद्दीन खिलजी 1303 ईस्वी में मेवाड़ पर आक्रमण करता है तो उसी समय मेवाड़ के सज्जनसिंह
महाराष्ट्र चले जाते हैं इन सज्जन सिंह जी की पांचवीं पीढ़ी के वंशज उग्रसेन हुए थे और उग्रसेन के दो पुत्र हुए जिनमें एक का नाम करण सिंह तथा दूसरे का नाम शुभकरण था शुभकरण के वंशज भोंसले के लाए और इसी शुभकरण की दो पुत्र हुए थे जिसमें एक मालोजी तथा दूसरी विठोजी थी इन दोनों भाई अपना जीवन यापन करने के लिए कृषि कार्य करना प्रारंभ कर दिया गया तथा कशिश से जीवन यापन में होने के कारण मालू जी लखुजी जाधव के अंगरक्षक बन गए इसी समय मालू जी की एक पुत्र होता है जिसका नाम शाहजी रखा जाता है कुछ समय पश्चात मालू जी लखुजी जाधव की नौकरी छोड़कर अहमदनगर की सुल्तान की यहां नौकरी करते हैं तथा वहीं दूसरी ओर शाहजी लखुजी जाधव की वहीं रहते हैं तभी लखुजी जाधव ने अपनी पुत्री जीजाबाई का विवाह सहा जी के साथ करते हैं जब 1620 ईस्वी में मालू जी की मृत्यु हो जाती है तभी शाहजी मलिक अंबर की सहायता से जहांगीर के दरबार में उपस्थित होते हैं तभी जहांगीर के द्वारा शाहजी को उमरा वर्ग दिया जाता है इसी समय 1624 ईस्वी में अहमदनगर तथा मुगलों के मध्य भटवाड़ी का युद्ध होता है इस युद्ध में मलिक अंबर तथा शाहजी के द्वारा मुगलों का प्रतिनिधित्व किया गया वहीं दूसरी ओर अहमदनगर की सुल्तान के द्वारा इस युद्ध में भाग लिया इस युद्ध में मुगलों को विजय प्राप्त होती है और इससे सहा जी की प्रतिष्ठा में भर्ती होती है तभी मलिक अंबर उनसे ईर्ष्या करने लग जाता है तभी शाहजी पुणे बीजापुर की सुल्तान की सेवा में चले जाते हैं 1630 ईस्वी में सहा जी पुनः शाहजहां की सेवा में उपस्थित होते हैं तभी शाहजहां के द्वारा शाह जी को 5000 का मनसब प्रदान किया जाता है तभी 1632 ईस्वी में अहमदनगर के सुल्तानमुतर्जा प्रथम की हत्या हो जाती है तभी शाह जी के द्वारा उसके पुत्र मुतर्जा द्वितीय को शासक बनाने की घोषणा की जाती है जिससे शाहजी शासन की संपूर्ण बागडोर अपने हाथों में लेते हैं और तभी मुगलों से द्वेष की भावना पैदा हो जाती है और 1634 36 ईसवी में शहाजी तथा मुगलों के मध्य संघर्ष प्रारंभ होता है अंत में शाहजी पराजित होते हैं और वह शाहजहां से समझौता कर लेते हैं और औरंगजेब के द्वारा अहमदनगर को अपने साम्राज्य में मिला लिया जाता है इसके पश्चात शाह जी के द्वारा कर्नाटक अभियान किया जाता है और 1639 ईस्वी में शीरा का अभियान तथा 1640 ईस्वी में बेंगलुरु विजय आदि प्रमुख है इसके पश्चात बीजापुर के सुल्तान के द्वारा 1648 ईस्वी में सहा जी को कैद कर लिया जाता है तभी शिवाजी के द्वारा विरोध करने पर उन्हें 1649 ईस्वी में रिहा किया जाता है और 1663 ईस्वी में शाह जी के द्वारा वेद नूर सेत्र पर अधिकार किया जाता है वह 1664 ईस्वी में शाह जी हिरन का शिकार करते समय घोड़ी से गिरने के कारण चोट लग जाती है जिसके कारण उनकी मृत्यु हो जाती है
मराठा का उद्धभव
मराठा शब्द का शाब्दिक अर्थ महान संघर्ष होता है जिसका उल्लेख ग्रांड डफ अपनी पुस्तक " हिस्ट्री ऑफ मराठा" में करते हैं तथा उन्होंने कहा है कि मराठों का उदय एक आकस्मिक अग्निकांड की भांति हुआ है वहीआंद्रेविंक नामक विद्वान ने मराठों का उदय एक षड्यंत्र के संदर्भ में माना है जो क्रमश 200 वर्ष बात कर्मिक विकास से होता है मराठों को मुगलों के खिलाफ दक्कन का रक्षा कवच समझा जाता है मराठों की शक्ति महसूस करने वाला पहला शासक जहांगीर था जिसने मराठों का केंद्र बिंदु दक्कन को माना तथा वह कहता था कि मराठी दुर्गेश जाति है जो इस देश की शक्ति का केंद्र है इनके पश्चात जदुनाथ सरकार के द्वारा शिवाजी के बारे में कहा है कि" मैं शिवाजी को हिंदू जाति का उत्पन्न किया हुआ अंतिम महान क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र का निर्माता मानता हूं" वही रानाडे के द्वारा" शिवाजी को नेपोलियन की भांति संगठित करने वाला व्यक्ति माना है"तथा रानाडे यह भी कहता है कि यदि औरंगजेब दक्षिणी भारत पर आक्रमण ने करता तो मराठों का उदय ना होता लेकिन यह है एक अतिशयोक्ति है क्योंकि मराठों का उदय जहांगीर के काल में ही हो गया था और वह शाहजहां के काल शाहजी एक नेतृत्व करने वाले व्यक्ति के रूप में ऊपर कर सामने आए थे
ऐसा कहा जाता है कि शिवाजी के वंशज जो पहले मेवाड़ राजघराने से संबंधित थे एक उल्लेख के अनुसार जब अलाउद्दीन खिलजी 1303 ईस्वी में मेवाड़ पर आक्रमण करता है तो उसी समय मेवाड़ के सज्जनसिंह
महाराष्ट्र चले जाते हैं इन सज्जन सिंह जी की पांचवीं पीढ़ी के वंशज उग्रसेन हुए थे और उग्रसेन के दो पुत्र हुए जिनमें एक का नाम करण सिंह तथा दूसरे का नाम शुभकरण था शुभकरण के वंशज भोंसले के लाए और इसी शुभकरण की दो पुत्र हुए थे जिसमें एक मालोजी तथा दूसरी विठोजी थी इन दोनों भाई अपना जीवन यापन करने के लिए कृषि कार्य करना प्रारंभ कर दिया गया तथा कशिश से जीवन यापन में होने के कारण मालू जी लखुजी जाधव के अंगरक्षक बन गए इसी समय मालू जी की एक पुत्र होता है जिसका नाम शाहजी रखा जाता है कुछ समय पश्चात मालू जी लखुजी जाधव की नौकरी छोड़कर अहमदनगर की सुल्तान की यहां नौकरी करते हैं तथा वहीं दूसरी ओर शाहजी लखुजी जाधव की वहीं रहते हैं तभी लखुजी जाधव ने अपनी पुत्री जीजाबाई का विवाह सहा जी के साथ करते हैं जब 1620 ईस्वी में मालू जी की मृत्यु हो जाती है तभी शाहजी मलिक अंबर की सहायता से जहांगीर के दरबार में उपस्थित होते हैं तभी जहांगीर के द्वारा शाहजी को उमरा वर्ग दिया जाता है इसी समय 1624 ईस्वी में अहमदनगर तथा मुगलों के मध्य भटवाड़ी का युद्ध होता है इस युद्ध में मलिक अंबर तथा शाहजी के द्वारा मुगलों का प्रतिनिधित्व किया गया वहीं दूसरी ओर अहमदनगर की सुल्तान के द्वारा इस युद्ध में भाग लिया इस युद्ध में मुगलों को विजय प्राप्त होती है और इससे सहा जी की प्रतिष्ठा में भर्ती होती है तभी मलिक अंबर उनसे ईर्ष्या करने लग जाता है तभी शाहजी पुणे बीजापुर की सुल्तान की सेवा में चले जाते हैं 1630 ईस्वी में सहा जी पुनः शाहजहां की सेवा में उपस्थित होते हैं तभी शाहजहां के द्वारा शाह जी को 5000 का मनसब प्रदान किया जाता है तभी 1632 ईस्वी में अहमदनगर के सुल्तानमुतर्जा प्रथम की हत्या हो जाती है तभी शाह जी के द्वारा उसके पुत्र मुतर्जा द्वितीय को शासक बनाने की घोषणा की जाती है जिससे शाहजी शासन की संपूर्ण बागडोर अपने हाथों में लेते हैं और तभी मुगलों से द्वेष की भावना पैदा हो जाती है और 1634 36 ईसवी में शहाजी तथा मुगलों के मध्य संघर्ष प्रारंभ होता है अंत में शाहजी पराजित होते हैं और वह शाहजहां से समझौता कर लेते हैं और औरंगजेब के द्वारा अहमदनगर को अपने साम्राज्य में मिला लिया जाता है इसके पश्चात शाह जी के द्वारा कर्नाटक अभियान किया जाता है और 1639 ईस्वी में शीरा का अभियान तथा 1640 ईस्वी में बेंगलुरु विजय आदि प्रमुख है इसके पश्चात बीजापुर के सुल्तान के द्वारा 1648 ईस्वी में सहा जी को कैद कर लिया जाता है तभी शिवाजी के द्वारा विरोध करने पर उन्हें 1649 ईस्वी में रिहा किया जाता है और 1663 ईस्वी में शाह जी के द्वारा वेद नूर सेत्र पर अधिकार किया जाता है वह 1664 ईस्वी में शाह जी हिरन का शिकार करते समय घोड़ी से गिरने के कारण चोट लग जाती है जिसके कारण उनकी मृत्यु हो जाती है
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